बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल
वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल
कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून.
लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून
@@@
इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार
नेताओं का रूप लिए ,निभा रहे किरदार
सुशील यादव
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया , छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी, लोभी दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती
गले कहीं तो दाल,रोटी की अलग गिनती
सुशील यादव
--
दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल
डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल
मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई
नुक्ता-बिंदी की महज ,गलतियां पकड़ा भाई
जरा उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे
बाते होती और ,गर्व कब रिसता दोहे
सुशील यादव
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
सुशील यादव
टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
##
मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास
कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
बदले में हर झूठ ,सच को कहाँ से लाएं
बस है यही कमाल तो,
रहता रावण सोचता,स्वर्ग सीढियां तान
पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान
कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
२ १ २ २ ,२ १ २ २ , २ १ २ २
अफवाहे चली हैं.....
आग झुलसे लोग.....
##
खून के छींटे पड़े हैं, पत्थर में अब
है शहादत खूब चर्चे खबर में अब
##
मुश्किल में था एक वो दिन साफ यारो
मगर अफवाहे चली हैं बंजर में अब
##
जब लुटेरा बन के लूटा गजनवी सा
तुमने पहचाना उसे हाँ रहबर में अब
##
याद हमको हैं खरोचें भी जरा सी
आग झुलसे लोग हैं इस शहर में अब
###
फैसलों की है घड़ी तो सोच रखना
कौन जीते जी दिखेगा कबर में अब
##
सुशील यादव
कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार
पहचान करे आप की ,मानव पर उपकार
मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश
नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश
उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश
निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती खामोश
सुशील यादव
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग
दुविधा के जंगल कई ,आहत अमन सुराग
११.८.१७
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध
१
रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान
पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान
गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला
ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला
इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता
गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता
सुशील यादव
11.8.17
२
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां
बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ
हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही
खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं
सुशील यादव दुर्ग
३
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती
गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती
सुशील यादव
४
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव दुर्ग
५
टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,वही सुख आधार बिना
सुशील यादव दुर्ग
##
६
आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है मौन कहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव दुर्ग
७
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून
सब लो भट्टी भून,गड़े मजहब का झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा
सुशील यादव दुर्ग
८
हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में
आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में
रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान कहीं
करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं
सुशील यादव दुर्ग
@@@
९
रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव दुर्ग
१०.
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला
सुशील यादव दुर्ग
---
११
--
दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल
डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल
मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई
नुक्ता-बिंदी की महज ,गलतियां पकड़ा भाई
जरा उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे
बाते होती और ,गर्व कब रिसता दोहे
सुशील यादव
भूली बिसरी याद कर,कोई छेड़ प्रसंग
भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग
माया -मदिरा संग ,मिले ये जिधर लुभाते
ठौर-ठिकाने छोड़ ,कसम के धूल उड़ाते
नराधमी जो लोग ,चढा दो उनको सूली
विकसित रहे समाज,याद कर बिसरी-भूली
इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार
पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार
--
मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत
राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत
--
नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
--
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध
--
सोते से अब जागिये ,होने को है देर
नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला
---
मन की बस्ती में लगी ,फिर नफरत की आग
जिसको देना था दिया ,हमको गलत सुराग
सुशील यादव
विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम
प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम --
---
एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार
बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार
---
वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर
भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर
--
लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ
पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ
कुछ दिन तो गुजारो ....
---
सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार |
चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ||
----
पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार |
देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार ||
---
वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार|
अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार ||
---
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार|
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार ||
---
मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार |
दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ||
---
सुशील यादव दुर्ग
10.8.17
किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर
कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार
---
रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध
पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध
रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान
टिका नहीं उस ज्ञान का,गर्व भरा अभिमान
सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
--
हम आजाद हैं ,
--
मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।
उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।
--
सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।
लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
--
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।
आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
--
ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।
तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।
--
आप लगा कर सोचते ,धूप- अगर-लोभान
मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान
--
सुशील यादव
14 अगस्त 17
अफवाहों के पैर में ....
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन
जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन
#
अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील
व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील
#
अफवाहें मत यूँ उड़े ,करते लहू-लुहान
मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान
#
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक
राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक
#
हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर
वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल
कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून.
लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून
@@@
इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार
नेताओं का रूप लिए ,निभा रहे किरदार
सुशील यादव
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया , छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी, लोभी दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती
गले कहीं तो दाल,रोटी की अलग गिनती
सुशील यादव
--
दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल
डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल
मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई
नुक्ता-बिंदी की महज ,गलतियां पकड़ा भाई
जरा उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे
बाते होती और ,गर्व कब रिसता दोहे
सुशील यादव
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
सुशील यादव
टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
##
मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास
कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
बदले में हर झूठ ,सच को कहाँ से लाएं
बस है यही कमाल तो,
रहता रावण सोचता,स्वर्ग सीढियां तान
पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान
कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
२ १ २ २ ,२ १ २ २ , २ १ २ २
अफवाहे चली हैं.....
आग झुलसे लोग.....
##
खून के छींटे पड़े हैं, पत्थर में अब
है शहादत खूब चर्चे खबर में अब
##
मुश्किल में था एक वो दिन साफ यारो
मगर अफवाहे चली हैं बंजर में अब
##
जब लुटेरा बन के लूटा गजनवी सा
तुमने पहचाना उसे हाँ रहबर में अब
##
याद हमको हैं खरोचें भी जरा सी
आग झुलसे लोग हैं इस शहर में अब
###
फैसलों की है घड़ी तो सोच रखना
कौन जीते जी दिखेगा कबर में अब
##
सुशील यादव
कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार
पहचान करे आप की ,मानव पर उपकार
मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश
नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश
उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश
निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती खामोश
सुशील यादव
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग
दुविधा के जंगल कई ,आहत अमन सुराग
११.८.१७
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध
१
रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान
पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान
गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला
ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला
इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता
गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता
सुशील यादव
11.8.17
२
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां
बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ
हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही
खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं
सुशील यादव दुर्ग
३
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती
गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती
सुशील यादव
४
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव दुर्ग
५
टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,वही सुख आधार बिना
सुशील यादव दुर्ग
##
६
आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है मौन कहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव दुर्ग
७
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून
सब लो भट्टी भून,गड़े मजहब का झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा
सुशील यादव दुर्ग
८
हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में
आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में
रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान कहीं
करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं
सुशील यादव दुर्ग
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९
रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव दुर्ग
१०.
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला
सुशील यादव दुर्ग
---
११
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दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल
डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल
मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई
नुक्ता-बिंदी की महज ,गलतियां पकड़ा भाई
जरा उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे
बाते होती और ,गर्व कब रिसता दोहे
सुशील यादव
भूली बिसरी याद कर,कोई छेड़ प्रसंग
भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग
माया -मदिरा संग ,मिले ये जिधर लुभाते
ठौर-ठिकाने छोड़ ,कसम के धूल उड़ाते
नराधमी जो लोग ,चढा दो उनको सूली
विकसित रहे समाज,याद कर बिसरी-भूली
इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार
पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार
--
मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत
राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत
--
नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
--
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध
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सोते से अब जागिये ,होने को है देर
नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला
---
मन की बस्ती में लगी ,फिर नफरत की आग
जिसको देना था दिया ,हमको गलत सुराग
सुशील यादव
विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम
प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम --
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एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार
बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार
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वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर
भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर
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लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ
पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ
कुछ दिन तो गुजारो ....
---
सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार |
चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ||
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पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार |
देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार ||
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वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार|
अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार ||
---
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार|
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार ||
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मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार |
दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ||
---
सुशील यादव दुर्ग
10.8.17
किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर
कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार
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रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध
पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध
रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान
टिका नहीं उस ज्ञान का,गर्व भरा अभिमान
सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
--
हम आजाद हैं ,
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मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।
उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।
--
सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।
लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
--
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।
आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
--
ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।
तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।
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आप लगा कर सोचते ,धूप- अगर-लोभान
मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान
--
सुशील यादव
14 अगस्त 17
अफवाहों के पैर में ....
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन
जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन
#
अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील
व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील
#
अफवाहें मत यूँ उड़े ,करते लहू-लुहान
मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान
#
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक
राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक
#
हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर
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