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धनाक्षरी 1
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    'पर' जिनके कटे थे ,वो परिंदे कहाँ  गए
     लो सीधे-सादे गाँव के, बाशिंदे  कहाँ गए
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     जमीन खा गई उसे ,कि निगला आसमान
     निगरानी शुदा थे जो , दरिन्दे कहाँ गए
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     बस इसी जगह तो,कल्पना का लोक था
     सब चीजें मिल रही ,घरौंदे कहाँ  गये
     $
     मजहब की जमीनो में,ये बारूद और  धुँआ
     ढेर लगे हैं लाशो के ,जिन्दे कहाँ गये
     $
     तेरे होने का सुकून ,रहता कहीं भीतर
     सर रखे हम रोते ,वो कंधे कहाँ गए
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                सुशील यादव


घनाक्षरी 2
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घुलने लगा जहर ,बेहाल जिंदगी में
गिनता हूँ जुगनू भी ,मै रात चांदनी में
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तुम गए नहीं देखो ,मुह फेरता समय
बदहाल जी रहे हैं ,भटके बेबसी में
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हमने लिखा रेत में ,खत तुम्हारे नाम
संदेश मिलता  होगा , सुखी हुई नदी में
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किसके वास्ते लौटा,बीता हुआ हर पल
हो लम्हों की खताए,सजा मिले  सदी में
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सजाना चाहो अगर, हमें जुड़े में  टांकना
बागो में  खिले मिलते, हैं फूल सादगी में
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सुशील यादव
न्यु आदर्श नगर दुर्ग


धनाक्षरी 3....
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आदमी बदला किए, था हालात की सूरत
अब आइना बदल , वो तसल्ली में है
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तेरी याद के जुगनूँ ,जब रात को चमके
समझे कि तन्हाई  ,अब  बिजली में है
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लहुलुहान हुआ है ,यहाँ फूल का मौसम
शजर झुलसने का ,गम तितली में है
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क्यों किया करती हो ,मुझको याद बारहा
धड़कन रुकी-रुकी  ,अभी हिचकी में है
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जाना हो हमसे दूर ,दबे पांव चल देना
मजा ! मन्नत, दुआ ,न दिल्लगी में है
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सुशील यादव
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