सामयिक दोहे
सत्तर बरस ओढ़-पहिन ,चिथरागे जी कोट
उज्जर असन धरे-बने ,करियागे सब नोट
सुशील यादव
20.12.16
मंदिर धजा उतार के ,पहिरे हव लँगोट
प्रभू नाम तो जापते ,मन में कतको खोट
सुशील यादव
२१.1२.१६
पन्ने बिखरे अतीत के ,सिमटा देखा नाम
बैठी रहती तू सहज ,पलक काठ गोदाम
हमको तुमसा आदमी,मिलता कभी-कभार
बिना जान पहिचान के ,देता नोट उधार
सुशील यादव
२२.1२.१६
नोट-काले जेब रखे ,उजली बहुत कमीज
तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज
सुशील यादव
27.12.16
सत्तर बरस ओढ़-पहिन ,चिथरागे जी कोट
उज्जर असन धरे-बने ,करियागे सब नोट
सुशील यादव
20.12.16
मंदिर धजा उतार के ,पहिरे हव लँगोट
प्रभू नाम तो जापते ,मन में कतको खोट
सुशील यादव
२१.1२.१६
पन्ने बिखरे अतीत के ,सिमटा देखा नाम
बैठी रहती तू सहज ,पलक काठ गोदाम
हमको तुमसा आदमी,मिलता कभी-कभार
बिना जान पहिचान के ,देता नोट उधार
सुशील यादव
२२.1२.१६
नोट-काले जेब रखे ,उजली बहुत कमीज
तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज
सुशील यादव
27.12.16
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