सुशील यादव
2122 2122 212२
सोच कर देखो कहीं कोई छुपा है
आदमी बेखौफ हो किधर जिन्दा है
वक्त आने दो मुनासिब सा हमारा
हम बता देंगे कहाँ कोई खपा है
हम नहीं जो पा सके,
२१२२ २१२२ २१२२
--
सूख कर मुझसा कोई, कांटा हुआ है
आज तुम ये देख लो,तमाशा हुआ है
--
जंग में हारा हुआ, लौटा सिपाही
महफिलों में आप ही, नकारा हुआ है
--
कौन घाटे बेचता, सौदा कभी भी
जब तलक मंदी का, ईशारा हुआ है
--
हम नहीं जो पा सके, फिर उस मुकाम को
छोड़ के आना जिसे, गवारा हुआ है
--
बुलन्दी पाने, 'सुशील' रहा तरसता
जरूरतों की फिक्र का, मारा हुआ है
--
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)
24.7.17
2122 2122 212२
सोच कर देखो कहीं कोई छुपा है
आदमी बेखौफ हो किधर जिन्दा है
वक्त आने दो मुनासिब सा हमारा
हम बता देंगे कहाँ कोई खपा है
हम नहीं जो पा सके,
२१२२ २१२२ २१२२
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सूख कर मुझसा कोई, कांटा हुआ है
आज तुम ये देख लो,तमाशा हुआ है
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जंग में हारा हुआ, लौटा सिपाही
महफिलों में आप ही, नकारा हुआ है
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कौन घाटे बेचता, सौदा कभी भी
जब तलक मंदी का, ईशारा हुआ है
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हम नहीं जो पा सके, फिर उस मुकाम को
छोड़ के आना जिसे, गवारा हुआ है
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बुलन्दी पाने, 'सुशील' रहा तरसता
जरूरतों की फिक्र का, मारा हुआ है
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)
24.7.17
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