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2122  2122 212
कातिलो के चेहरे ....
खून के छींटे पड़े ,पत्थर  में अब
कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब
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कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का
फैलती अफवाह ये  बंजर में अब
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कल  लुटेरा बन के लूटा गजनवी
तुमने पहचाना उसे रहबर में अब
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याद हमको हैं खरोचें भी जरा
लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब
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फैसलों की ये घड़ी शायद  नहीं
जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब
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मेरी पेशानी में है यायावरी
कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब
##
सुशील यादव

122२    1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना दोगे सलीके से मुझे लायक
नजर की धूल पीछे महज सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते तरीके से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा कि नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत की मेरी
मिसाल के तौर जिनको सुई चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
#
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़





एक अजायबघर ...
___
योजना है नगर विन्यास की
गांधी पुतले के चारों तरफ
बाउंड्री डाल
अजायब घर के शिलान्यास की
वैसे
अजीब है
पूरा ये शहर
फिर क्या जरूरत
बने यहां अजायब घर ....?
###
कुछ ज़िंदा नमूने,
तरह-तरह
विषैले साँप,
जो डसते नहीं
बस काटते हैं
ख़ास मौको पर
फुफकारते ,
डांटते हैं
बतौर उदाहरण ये
अधिकारी कहलाते हैं
ढोल ....नाकामी के
सरकारी अनुदान पर बजाते हैं
#
यहाँ के कुत्ते जनाब
भौकते कम
तलुए ज्यादा चाटते हैं
ये नेता के चमचे कहलाते हैं
परमिट -लाइसेंस के लिए
चप्पलें कहाँ -कहाँ  घिसोगे ....?
गेहूं में घुन सरीखा
अपनी जिंदगी को
बेमताब पिसोगे ....?
इनकी शरण में काम बन जाएंगे
आपके बंगले
इस बहाने ,दो-चार तन जाएंगे
#
बन्दर किस्म के कुछ
नौसिखिये भी हैं ,
जो बापू के चश्मे को
गांधी-जयंती पर साफ कर आते हैं
फिर खुद को
गंगा में नहाया -धुला
साफ बताते हैं
इन्ही की हरकतों से
देश में तबाही का मंजर है
बात अहिंसा की ये करते मगर
नीयत में
धारदार
ख़ंजर है ....?
#
ये  बुरा
न देखने
सुनने
कहने ...
का ढोंग भरते हैं
मगर मतलब के लिए
इनके
नए मायने निकाल लाते हैं
ताजिंदगी उसी कमाई को खाते हैं
#
इनका
मौक़ा ऐ वारदात पर
मौजूद रहना ...
फिर तफसील से
अदालत में
शपथ के साथ ..
आँखों देखे वारदात का कहना
गजब ढाता है
ये अपने को जब
हरिश्चंद्र का बाप बताता है ...
इसे
सुने को मरोड़ना
कहे से  मुकरना
भी आता है
आजकल पता चला है
खादी पहने से घबराता है
#
ये आदतन किस्म के  अपराधी
नब्बे प्रतिशत ....
नेता बन जाते हैं,यही...
मजे-मजे देश चलाते हैं
 ##
गांधी पुतले की योजना में
कुछ नया करना होगा
अजायब घर में
दिखावे के नाम पर रोने वाला
मगरमच्छ केवल ...
पिजरे में भरना होगा
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एक निशानी प्यार की .... कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन  भोग सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग सुशील यादव कोई नहीं अब सामने ,नहीं चुनौती शेष लंका सारी ढह गई  ,बचा नहीं लंकेश पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम तुमको भाता छीनना ,तुलसी से सिय-राम एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार सुशील यादव मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव ...
सबकी नावें ..... # केवल सुख आधार नहीं है कल्पना में विस्तार नहीं है # सबकी नावें पार उतरती अपना बेड़ा-पार नहीं है # नगद-नगद ही कसमे खाई तुमसे कहीं उधार नहीं है # सुलग-सुलग जाती ये बस्ती सोई कहीं सरकार नहीं है # जात-पात नाम ठगी है ढाई-आखर दरकार नहीं है # बेच के घोड़े मस्ती में सोए किस्मत-धनी लाचार नहीं है # अंधविश्वास सबकी बीमारी ठोस कहीं उपचार नहीं है # लोग नफा-नुकसान सोचें चाहत अपना व्यापार नहीं है # सुशील यादव