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2122  2122  2122  22

कुछ नजरबन्दी,,,,

रात भर सोया नहीं , पलकों खुमारी सी है
कुछ तो तेरी तलब है ,कुछ बेकरारी सी है

उखड़ जाते  टूट के  चट्टान   पहाड़ों से
चाह की सूरत में फिसली बद्दुआ जारी सी है

रेशा -रेशा चल न दे वो  ख्वाबगाहों से दूर
तिनका-तिनका आजकल उसकी  तैयारी सी है

घूरते हैं वो मेरी छत  इस तरह गोया कहीं
सूचना बस  टूटने की जेब जारी सी है

मेरे घर के आसपास रहा किये  है जमघट
कुछ नजरबन्दी लगे  कुछ पहरेदारी सी है

सुशील यादव
7.11.17

@@2
अब भी मेरी पलकों  में खुमारी सी है
कुछ तेरी  तलब कुछ बेकरारी सी है

उखड़े हुए हैं चट्टान पहाड़ों से
असर किसी बद्दुआ की जारी सी है

रेशा -रेशा चल न दे दूर  ख्वाबगाहों से
तिनका-तिनका में आजकल  तैयारी सी है

वो घूरते हैं मेरी छत को इस तरह गोया
कोई सुचना इसके टूटने की जारी सी है

मेरे घर के आसपास रहती है जमघट
कुछ नजरबन्दी सी कुछ पहरेदारी सी है @@
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