2122 १२२२ 2212
जिसे सिखलाया बोलना.....
चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा
जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा
दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा
बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा
अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा
बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव
६.१०.१६
जिसे सिखलाया बोलना.....
चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा
जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा
दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा
बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा
अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा
बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव
६.१०.१६
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