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छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा.....

जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा
रिश्तों को, अचानक तोड़ना,अच्छा नहीं लगा
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मातमपुर्सी आते, लोग हैं आजकल इस तरह
रस्मो को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा
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काबिल हो अभी माफी के दीगर बात है वर्ना
जगह-जगह पे हो जाते रुसवा, अच्छा नहीं लगा
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तुम सम्हाल लो अपनी तमाम ये सल्तनत यहीं
कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा
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गम के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'
'नोटों' आप-खुद का बिखरना, अच्छा नहीं लगा
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लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ
छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा, अच्छा नहीं लगा
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सुशील यादव
14.12.16

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