किस मिटटी के हो बने ,माधो मेरे यार
नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार
छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात
शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात
सुशील यादव
9.11.17
अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस
नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस
महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न काम
बातो की बस छूरियां,संकट रहता राम
सुशील यादव
कोमल मुरझाया
डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल
नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार
छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात
शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात
सुशील यादव
9.11.17
अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस
नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस
महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न काम
बातो की बस छूरियां,संकट रहता राम
सुशील यादव
कोमल मुरझाया
डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल
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