सुशील यादव के दोहे ...
२.१२.१७
susyadav7@gmail.com
New Adarsh Nagar
Zone 1,Street3
Durg (C.G.)
जग में सारे घूम के ,लगता रहा कयास
ऊपरी धन का जोड़ना,करता बहुत उदास
रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग
कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग
खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन
कल जो तू सरताज था,मत कर आज यकीन
जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम
जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम
बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल
वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल
कौन किया है बोल भी,पानी तेरा खून.
लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून
आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान
फिर से लंका जीत अब ,थका हुआ हनुमान
समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग
सोच समझ के तौलता ,भाई है बजरंग
भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग
भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग
इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार
नेताओ के रूप में ,निभा रहे किरदार
हम आजाद हैं ,
--
मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।
उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।
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सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।
लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
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पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।
आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
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ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।
तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।
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सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान
मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान
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कुछ दिन तो गुजारो ....
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सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार |
चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ||
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पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार |
देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार ||
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वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार|
अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार ||
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पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार|
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार ||
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मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार |
दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ||
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कल की आहत द्रोपदी ...
संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान
भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान
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जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज
लहरें भी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज
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अपने मकसद डालता,देख परख के घास
जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास
किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश
कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश
४,
राखी के दोहे
बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज
विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज
छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज
भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज
सोने मांगू बालियां ,नही मोतिया हार
भाई तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार
सामयिक दोहे
कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत
समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत
**
ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग
राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग
**
नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट
कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट
**
फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील
किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील
**
थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत
सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत
**
अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल
रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल
पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप
विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप
महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश
लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास
संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग
दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग
संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह
--
काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून
देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून
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होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौंक
मन माफिक तो चर लिया,बिन बघार बिन छौंक
किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक
कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक
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फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप
टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप
--
चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट
हैरत देके खैरियत,पूछे कभी न चोट
--
रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर
कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और
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दीमक बन के खा रही ,दीमागी भूगोल
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल
--
जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट
उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट
--
ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात
निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात
--
शहर मचा कुहराम...
##
सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम।
छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम
##
सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार
बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार
##
नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग
ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग
##
मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज
दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज
##
अफवाहों के पैर में ....
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन
जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन
#
अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील
व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील
#
अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान
मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान
#
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक
राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक
#
हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर
बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल
साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल
#
बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन
पानी- पानी ढूढते,नीचे पैर जमीन
#
मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम
फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम
#
गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार
कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार
#
जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग
करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग
#
प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन
मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन
#
मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम
सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम
#
कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार
जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार
#
फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार
बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार
#
मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत
राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत
#
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
---
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला
फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब
लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब
--
जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार
हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार
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हैं खूनी छीटे पड़े ,पत्थर महज जनाब
रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब
---
जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और
मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर
--
तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार
काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार
---
हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज
समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज
---
रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान
पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान
--
हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम
मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम
संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात
जब ये आवें साथ में ,जगत हुआ बौरात
इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम
भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत राम
--
सामयिक दोहे
ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल
जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल
--
आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार
तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार
--
दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल
***
भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन
मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन
--
रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच
पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच
इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार
पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार
--
मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत
राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत
--
नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
--
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध
नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध
--
सोते से अब जागिये ,होने को है देर
नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर
--
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग
जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग
विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम
प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम --
---
एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार
बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार
---
वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर
भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर
--
लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ
पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ
मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास
कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास
##
कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
##
बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच
जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच
##
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल
##
आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल
कसैला अगर स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल
##
सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग
कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग
##
किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर
कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार
मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार
---
रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध
पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध
सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार
हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान
पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान
गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला
ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला
इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता
गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता
संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह
सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार
साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार
संकट में हो निकटता, दुःख के क्षण हो नेह
ख़ुशी-ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह
आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार
आगे-आगे मैं झुकूं ,तेरे पालनहार
#
इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास
आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास
#
चुनाव-रथ में बैठकर ,देने को सौगात
निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात
#
अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव
सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव
#
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत
यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत
@@
#
लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत
हर दुविधा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत
#
उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश
निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती खामोश
#
चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट
हैरत है जी खैरियत,पूछे कभी न चोट
--
जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज
भँवर भी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज
#
वेलेंटाइन प्रेम दिन ,कुछ तो है जी ख़ास
डाल सको तो डाल दो ,मेरे को भी घास
##
राजनीति मैदान में...
--
सहज देशहित सोचिये,व्यापक रखें प्रसंग
राजनीति बस जा धुसी ,ओछे लोगो सँग
--
राजनीति मैदान में ,लूटो कटी पतंग
आसमान फिर शान से ,दिखला अपना रंग
--
बेच-खरीदी बढ़ रहे, विधायकी के भाव ,
जनता डूबी बाढ़ में ,सूझे किसे बचाव
--
रोक सको तो रोक लो,राजनीति के पैर
जनता संकट में घिरी ,कहीं न उसकी खैर
--
किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश
कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश
इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक
किस -किस को अब मारिये ,बहुत सहे अतिरेक
--
लगती है जो आग ,कहाँ बुझ पाती बोलो
मिटटी के फिर भाव ,बचे को जी भर तोलो
--
जिन्दा है ये कौम ,बता दो गर हो जीवित
आकर देखें लोग, बता अपना ज्ञान गणित
--
बेच खरीदी राह में ,विधायको के भाव
जनता डूबी बाढ़ में, करना किसे बचाव
भारी भरकम वोट से,चुनती जिसे जनता
अब देना धोखा उसे ,राहों नहीं बनता
चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट
हैरत देके खैरियत,पूछे कभी न चोट
आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार
तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार
इस कमरे में बन्द है ,पुरखों का इतिहास
आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास
ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात
निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात
तुम्ही चल रहे हो तो ये काफिला ज़िंदा है
शब्द वीर बलवान को ,मैं भी करूँ पसंद
दंगल खातिर लिख रहे ,दोहे जैसा छंद
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत
यादों के पत्ते झरे , आदि न जिसका अंत
@@
कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप
फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप
भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग
सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग
तेरे बस में अब नहीं ,बस में करना आज
बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज
हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन
किसी ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन
कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल
अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल
नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग
वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग
ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप
फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप
##
मन की जैसी धारणा ,वैसा रख उत्साह
एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह
#
हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन
ड्राइंग रूम में रखा ,बिगड़े ना कालीन
#
होली जैसी गालियां ,आम हई सब ओर
कहो इसे हुड़दंग या ,कहो चुनावी शोर
#
होली जैसी गालियां ,आम हुआ सब ओर
कहो इसे हुड़दंग या ,कहो चुनावी शोर
#
फागुन में क्यों साँवरे ,मन आकुल हो जाय
बिना कहे सब जानती ,सखी नेह लिपटाय
#
बैरागी गाता रहे ,विरहा व्याकुल गीत
जाने अब किस हाल में,तुम हो मेरे मीत
वेलेंटाइन प्रेम दिन ,कुछ तो है जी ख़ास
डाल सको तो डाल दो ,मेरे को भी घास
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत
यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत
@@
किसे सुनाये दास्ता,जिसका आदि न अंत
क्यों माथा है पीटता,करता काहे मलाल
वोटर तेरे गाल में, मलता नहीं गुलाल
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कौन चढाता है हमें ,कोमल-नाजुक झाड़
खुद है हमको नापना,ऊंट बड़ा कि पहाड़
आ खुद ही कद नाप ले ,नीचे ऊंट पहाड़
#
रंगों में घुलता रहा ,शनै-शनै ही भंग
आसमान कटती रही ,तानी हुई पतंग
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छोडो भूली याद को ,गुजरा समय प्रसंग
साथ एक फागुन गया ,दूजा सावन संग
#
आते कल की फिर सुनो ,ध्यान लगा संकेत
पछताना क्या देख के ,चुगती चिड़िया खेत
#
अंगद के जैसा जमे,उखड़े कहीं न पाँव
लूटे सौ-सौ गजनवी,उजड़ न पाए गाँव
जर्जर कितने हो गए ,मजबूती के आधार
जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार
आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीन
तेरे पन से तू मिटा ,बदला वहम- यकीन
##
लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर
हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर
सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर
तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर
आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर
शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर
मन बबूल से छिल गया ......
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।
मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार ।
कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।
अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान ।
दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।
जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास ।
फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।।
मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल
कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल
##
जाने कैसे लोग ये ....
##
जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।
बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।।
##
आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।
भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।।
##
जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज।
वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज।।
##
एक अधम से काम ने,औरो की ली जान।
कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।।
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत
यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत
बैरागी गाता रहे ,विरहा व्याकुल गीत
जाने अब किस हाल में,तुम हो मेरे मीत
प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन
मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन
##
मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम
सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम
खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन।
हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।।
##
तिनका-तिनका तोड़ के ,रख देता है आज
है कहीं अकड की बस्ती ,फिजूल कहीं समाज
परिभाषा देशहित की ,पूछा करता कौन
बहुत खरा एक बोलता ,दूजा रहता मौन
भव-सागर की सोचते ,करने अब की पार
गए निकल चुकाने तभी ,गिन-गिन कर्ज-उधार
गया उधर एक मालया ,हथिया के सब माल
किये हिफाजत लोग वे ,नेता, चोर, चंडाल
देश कभी तू देख गति ,है इतनी विकराल
यथा शीघ्र सब जीम के ,खाली करो पंडाल
मुह क्यों अब है फाड़ता ,कमर तोड़ है दाम
किसको कहते आदमी ,चुसा हुआ है आम
लगता है सबको बुरा ,गिनती के दिन चार
इभन-आड के फेर में ,ताक रहे इतवार
कहते जो कहते रहें,पानी बिन सब सून
सर्किट हाउस ले मजे ,तन्दूर मुर्गा भून
आई पी एल खेल मे , देश सहे ये मार
मिनट करोड़ों मिटा रहे ,सींचय खेत न खार
माङ्ग किये जो आरक्षण ,ठूसे उनको जेल
इस सरकार की इंजन ,डाले जिनने तेल
देशद्रोह के जुर्म का ,लगना है अब आम
किसकी चलती देश में ,किसके हाथ लगाम
बन में सूखी लकड़ियाँ ,घर में सुलगे देह
धुँआ -धुँआ होता रहे ,मन उपजा संदेह
मौन जुलाहा कह रहा,ले धागा औ सूत
ताने से तन ढांक ले,बाने से मन भूत
अस्पताल में देखिये ,मरीज रह चिल्लाय
मरहम पट्टी छोड़ के ,नर्स रही बतियाय
तीरथ कर लौटा अभी ,देखा चारो धाम
मन भीतर क्या झांकना ,जहाँ मचा कुहराम
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान
चार-दिवस सब पाहुने ,सुख के चार-पुराण
मिल जाए जो राह में, साधू -संत -फकीर
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन , ज्ञान-अबीर
दोहे ...
मंजिल तेरी पास है ,ताक रहा है दूर
चुपड़ी की चाहत करे ,जला ज्ञान-तंदूर
पर्वत देख उचाइयाँ, मन चकराता जाय
काश इतना ही उंचा,ध्वज भाग फहिराय
पर्वत देख उचाइयाँ,नेता करे विचार
कुछ इत्ती उंचाई के ,बंगले हो दो-चार
आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर
तब तब हिलते पांव भी ,नीव जहाँ कमजोर
##
कालिज के लडके यहाँ ,फूकन बस को आए
कुछ जुगाड़ की रोटियां ,इस विधि ही मिल जाए
लड़का है प्रदेश में,करता क्या करतूत
रेशम का कीड़ा बना, चढा पेड़ शहतूत
##
कल आया था बाटने, सुख -दुःख का संदेश
फोन ,कबूतर, डाकिया, उड़ता गया विदेश
पता भूलकर डाकिया,मन ही मन पछताय
बिन पते, चिठ्ठियाँ बहुत ,निश-दिन कौन पठाय
संयम दामन में लगे ,दुविधाओं के दाग
मन आंधी फैला गई,तन जंगल में आग
अक्षर-अक्षर बस छोड़ता ,व्यापक विष का बाण
बात कभी मत वो लिखो ,व्याकुल कर दे प्राण
मुझको अब भाता नहीं ,फूल बगीचा बाग़
रह-रह के डस जाए है ,काली रातें नाग
रिश्ते-नाते हैं कहाँ ,छूट गया घर-बार
वीराने में रोए मन, ऐसा क्यूँ है प्यार
तुमको रंज है फूल से ,खुशबू से परहेज
कैसे ब्याही बेटियां , दिए बिन दान-दहेज
पाँव पड़े हैं कब्र पर ,बातें अफलातून
दांत दिखाने को बचे ,मांग रहे दातून
###
महुआ झरता पेड़ से, मादक हुआ पलाश
लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास
लेकर आया डाकिया ,ख़त इक मेरे नाम
बिन खोले मै जानता,भीतर का पैगाम
दुःख की चादर समेट के ,सुख की जोहे बाट
अच्छे दिन की आस ने , सबकी उलटी खाट
कौन- कहाँ पीछे रहा ,चलते चलते साथ
घर -घरौंदा गया बिखर ,किसका छूटा हाथ
पसरी केवल सादगी ,छूट गया सब मोह
एक जंगल के रास्ते ,दूजा खुलता खोह
उजड़ी हो मन बस्तियां ,बिखरा हो सुनसान
ऐसे में तुमसे मिलें ,मुश्किल है पहचान
पात टूटा टहनी से ,गिरा शाख से फूल
पतझर मौसम भी लगे ,नेता का ऊसूल
कथनी औ करनी कहीं , अंतर इतना जान
मुँह चले नेतागिरी,सांस चले तो प्राण
जग की घर की बात है ,भीतर-बाहर चोर
कोई लूटे शाम को ,कोई लूटे भोर
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बन में सूखी लकड़ियाँ ,घर में सुलगे देह
धुँआ -धुँआ होता रहे ,मन उपजा संदेह
मन जुलाहा कहा किया ,ले धागा औ सूत
ताने से तन ढांक ले,बाने से मन भूत
सांई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत
पीढी को जो तार दे ,जनमे वही सपूत
लकड़ी में कब घुन लगे ,लोहे में कब जंग
यश-अपयश सब साथ है ,भले -बुरे के संग
तू भी बन के देख ले ,पंडित, पीर-फकीर
राम -रहीम दुवार में ,कौन गरीब-अमीर
मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर
चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान
चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण
तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम
मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम
मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन , ज्ञान-अबीर
जिससे भी जैसे बने, ले झोली भर ज्ञान
आलोकित जग जो करे ,मगज रखा सामान
एक जुलाहा हुआ चकित ,देख सूत कपास
तन से क्या ताना बुने,मन बाना विश्वास
जिसको हम समझा किये ,अपने बहुत करीब
वो ही आखिर बन गया , आड़े प्यार रकीब
मन भंवरा मंडरा रहा , तुझे समझ के फूल
यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल
मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम में बौर
बिन तुझसे मिल-भेंट के ,हलक न उतरे कौर
किस तपसी ने तप किया ,मल के राख भभूत
आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत
देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर
ऊपर से बुन क्या दिया,विरासत कि तकदीर
लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर
खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर
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नफरत के इस कुम्भ में,खोज प्रेम लेवाल
जिसके भीतर 'मै' घुसा,उतरे तो वह खाल
जड़ गया वो माथे में ,मुझसे जुडा सवाल
ले हाथो में उस्तरा , बजा गया जो गाल
गली-गली में जीत का, सिक्का तभी उछाल
अगर खजांची बाप हो ,घर में हो टकसाल
माथे को क्यों पीटना ,होता किसे मलाल
देने वाला देखता ,है छप्पर किस हाल
दिन-रात कौन पूछता ,एक सरीखा सवाल
ले हाथो में उस्तरा , बजा रहे क्यूँ गाल
लिखिए कुछ ऐसा मनुज,सज उठे वर्तमान
हो टक्कर की लेखनी ,रख आत्मसम्मान
कोलाहल हो 'जग' अगर,बनो शान्ति के दूत
ले चरखा फिर हाथ में ,सुख के कातो सूत
वाणी में अमृत घुले, रहे मधुर आवाज
परिपाटी हो स्थापना , जिसको कहें रिवाज
तुमसे क्या-क्या मांगता ,व्याकुल आज समाज
स्वर्ण नोक बना कलम ,पहना दो फिर ताज
स्वारथ सभी छोड़ दो ,त्याग दो अहंकार
परमार्थ में जी लगा ,जानो तुम संसार
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून
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हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग
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जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब
शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब
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डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल
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अपने मकसद डालता,देख परख के घास
जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास
लापता कहीं हो गई , पुत्र-मोह ललटेन
मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन
कौन छुआ बुलन्द शिखर,कौन हुआ भयभीत
समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत
ओढ़ पहन के बैठना, नैतिकता की खाल
जनता केवल है खड़ी,चौरहे बेहाल
फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील
जो अन्धेरा देखती ,पैरों कांटे कील
संकट में हो निकटता,रखना दुःख के क्षण नेह
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक ये देह
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कितना लगता है बुरा ,गिनती के दिन चार
इभन-आड के फेर में ,ताक रहे इतवार
पत्ते विहीन टहनियां ,शाख फूल विहीन
कुर्सी दावेदार ही ,स्टूल रहे अब छीन
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डोर न ढीला छोड़ना ,प्रीत पतंग उडाय
बिन मागे कुछ तो मिले,मांग के कछु न पाय
उलझे मन की बात ये ,कभी न सुलझी डोर
रात करवटें ले कटी ,झपकी आती भोर
जनता की दरबार है ,जनादेश सब होय
राज-रंक पल में करे ,आप न समझे कोय
मोदी तेरे राज में ,दीन -दुखी हैं लोग
अच्छे दिन बुखार चढ़य,बुरे दिनो के रोग
इस कमरे में बन्द है ,पुरखों का इतिहास
आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास
ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात
निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात
तुम्ही चल रहे हो तो ये काफिला ज़िंदा है
शब्द वीर बलवान को ,मैं भी करूँ पसंद
दंगल खातिर लिख रहे ,दोहे जैसा छंद
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत
यादों के पत्ते झरे , आदि न जिसका अंत
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व्यभिचारी मारो भगे,अवगुण रहे न शेष
इस धरती में चाहिए ,सबसे उत्तम देश
SUSHIL YADAV <DURG >
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