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२ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २

सुशील यादव

जिद की बात नहीं....

है कौन जिसे दर्द का एहसास नहीं होता
सब कुछ होते हुए भी,कुछ पास नहीं होता
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चल देते हैं छोड़ , करीबी लोग अचानक
लुट जाने का मन को आभास नहीं होता
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मै अपने तर्कों की दुनिया में हूँ  तनहा
तेरी दखल यहाँ कोई , ख़ास नहीं होता
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हर शाम बुझा रहता, ये दिल एहतियातन
जुगनू अच्छे लगते,जब उजास नहीं होता
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समझा के रखता हूँ दिल-ए-नादाँ को तभी
जिद की बात नहीं, बहुत उदास नहीं होता
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सुशील यादव

कौन है जिसे दर्द का, एहसास नहीं होता
सब कुछ होते हुए, कुछ पास नहीं होता
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छोड़ कर चल देते हैं करीबी लोग अचानक
उनके छोड़ जाने का मन को आभास नहीं होता
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मै अपने तर्कों की दुनिया में रह जाउंगा तनहा
तेरी दखल मेरी जिन्दगी में अब ख़ास नहीं होता
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बुझा देता हूँ शाम से  चिरागों को एहतियातन
जुगनू भी अच्छे लगते हैं जब उजास नहीं होता

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समझा के रखता हूँ दिले नादाँ को बारहा
किसी बात की जिद नहीं ,उदास नहीं होता
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१३.८.१६

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