सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश
कैसे मूक बधिर रहे ,बैठे थे खामोश
जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम
कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम
सुशील यादव
खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर
जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर
अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द
राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द
किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल
लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिम काल
हम भी नहा-निचोड़ के ,बैठे हुए शरीर
दिमाग लेकिन देखता , अधनंगी तस्वीर
कैसे मूक बधिर रहे ,बैठे थे खामोश
जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम
कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम
सुशील यादव
खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर
जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर
अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द
राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द
किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल
लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिम काल
हम भी नहा-निचोड़ के ,बैठे हुए शरीर
दिमाग लेकिन देखता , अधनंगी तस्वीर
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