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दोहे ...
सुशील यादव  दुर्ग
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दुनिया  समझती है नहीं,नहीं समझते आप
मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप
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संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान
शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान
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सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल
शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल
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करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार
साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार
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कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग
हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग
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भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल
अपना सिक्का ढालने,बिठा रही  टकसाल
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हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय
झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय
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उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान
दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान
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खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज
ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज

सुशील यादव  दुर्ग


खाने को  मुहताज थे,अब है छप्पन भोग
नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग

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इतने सीधे लोग भी  ,बनते हैं लाचार
कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार
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दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात
लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात
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७ अक्टूबर
५ अक्टूबर १७
सरहद  रखवाली लगे ,अपने वीर जवान
उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान
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जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार
बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार




सुशील यादव
अब अतीत क्या खोदना ........

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास ।
बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।
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मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल
अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल
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राहत जिसे  ,ये वंचित से लोग ।
छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग ।।
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मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम ।
तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम ।।
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एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर ।
असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।
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5 अक्टूबर 17




व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष
हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश

जिस दिन से बन्दी  हुआ,साधू लिपटा भेष
इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष

आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष
अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष

पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद
बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद

कैसे  बन्द किया कहो,सांसो का अनुवाद

जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार
जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार
सुशील यादव
१९.९.१७

आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीन
तेरे पन की महक से ,इतरा रही  जमीन
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लक्ष्य निशाने  साधिए ,शीतल वचन समीर
हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर
सुशील यादव

सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर
तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर
सुशील यादव

आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर
शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर
सुशील यादव ,दुर्ग

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