बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून. लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून @@@ इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओं का रूप लिए ,निभा रहे किरदार सुशील यादव गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे है माया , छल-कपट,किसके कौन सहारे पापी, लोभी दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती गले कहीं तो दाल,रोटी की अलग गिनती सुशील यादव -- दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई नुक्ता-बिंदी की महज ,गलतियां पकड़ा भाई जरा उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे बाते होती और ,गर्व कब रिसता दोहे सुशील यादव सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार सुशील यादव टेलीपेथी ... बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय ## मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास खंगाल रहे क्यों...
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