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आम आदमी .....
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हमने तुमको नोट बदलते नहीं देखा
काले-उजले फेर में चलते नहीं देखा
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तुम सितमगरों की दुनिया,रहने के आदी
चट्टान दबे नीचे, निकलते नहीं देखा
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जो आज कमा ली,हो गया बसर के लायक
हो ईद- दिवाली कि , उछलते नहीं देखा
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टूटे हुए लगते हैं सभी चाँद सितारे
किस्मत की बुलन्दी को निगलते नहीं देखा
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पानी की तरह हो गया है खून तुम्हारा
खूं जैसे इसे हमने उबलते नहीं देखा
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सुशील यादव
221 1221 1221 122

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