किस मिटटी के ...(राधिका छंद,13-9)
छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी रात
सुबह-सुबह के कोहरे ,बर्फ दबी बात
अगहन के दिन आलसी ,पूस नहीं काम
अब अलाव में राख है ,आग नहीं राम
महाकाय सी छवि बनी, व्यर्थ मगर नाम
बातो की बस छूरियां,रखे बगल राम
किस मिटटी के हो बने ,यार माधो बोल
नेता जडे दुलत्तियाँ ,बन्द समझ खोल
सुशील यादव
जैसी सूखी लकडियाँ , सुलग रही देह
धुंआ- धुआ होता रहे ,पाप मन स्नेह
सुशिल यादव ,दुर्ग
छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी रात
सुबह-सुबह के कोहरे ,बर्फ दबी बात
अगहन के दिन आलसी ,पूस नहीं काम
अब अलाव में राख है ,आग नहीं राम
महाकाय सी छवि बनी, व्यर्थ मगर नाम
बातो की बस छूरियां,रखे बगल राम
किस मिटटी के हो बने ,यार माधो बोल
नेता जडे दुलत्तियाँ ,बन्द समझ खोल
सुशील यादव
जैसी सूखी लकडियाँ , सुलग रही देह
धुंआ- धुआ होता रहे ,पाप मन स्नेह
सुशिल यादव ,दुर्ग
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