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एक निशानी प्यार की ....

कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल
एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल

नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन
चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन

शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग
खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन  भोग

सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख
शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख

हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल
कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल

तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद
नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद

कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल
संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल

माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक
राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक

मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग
तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग

सुशील यादव
कोई नहीं अब सामने ,नहीं चुनौती शेष
लंका सारी ढह गई  ,बचा नहीं लंकेश

पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम
तुमको भाता छीनना ,तुलसी से सिय-राम

एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार
दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार
सुशील यादव


मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव
बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव


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