122२ 1222 1222
वही बस्ती, वही टूटा खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है
कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
#
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़
फेलुन १४
छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब का हकलाना
#
हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
#
बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता है
यादों के जंगल भीतर तक, पैरहन भिगा जाना
#
लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
#
सुशील यादव
वही बस्ती, वही टूटा खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
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बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है
कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
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वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
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उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे चुभोना है
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तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
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सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़
फेलुन १४
छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब का हकलाना
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हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
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बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता है
यादों के जंगल भीतर तक, पैरहन भिगा जाना
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लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
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सुशील यादव
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