सबकी नावें .....
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केवल सुख आधार नहीं है
कल्पना में विस्तार नहीं है
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सबकी नावें पार उतरती
अपना बेड़ा-पार नहीं है
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नगद-नगद ही कसमे खाई
तुमसे कहीं उधार नहीं है
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सुलग-सुलग जाती ये बस्ती
सोई कहीं सरकार नहीं है
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जात-पात नाम ठगी है
ढाई-आखर दरकार नहीं है
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बेच के घोड़े मस्ती में सोए
किस्मत-धनी लाचार नहीं है
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अंधविश्वास सबकी बीमारी
ठोस कहीं उपचार नहीं है
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लोग नफा-नुकसान सोचें
चाहत अपना व्यापार नहीं है
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सुशील यादव
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केवल सुख आधार नहीं है
कल्पना में विस्तार नहीं है
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सबकी नावें पार उतरती
अपना बेड़ा-पार नहीं है
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नगद-नगद ही कसमे खाई
तुमसे कहीं उधार नहीं है
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सुलग-सुलग जाती ये बस्ती
सोई कहीं सरकार नहीं है
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जात-पात नाम ठगी है
ढाई-आखर दरकार नहीं है
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बेच के घोड़े मस्ती में सोए
किस्मत-धनी लाचार नहीं है
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अंधविश्वास सबकी बीमारी
ठोस कहीं उपचार नहीं है
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लोग नफा-नुकसान सोचें
चाहत अपना व्यापार नहीं है
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सुशील यादव
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