मन बबूल से छिल गया ......
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।
मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार ।
कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।
अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान ।
दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।
जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास ।
फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।।
सुशील यादव
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।
मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार ।
कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।
अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान ।
दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।
जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास ।
फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।।
सुशील यादव
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