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मन बबूल से छिल गया ...... हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन । मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।। पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार । कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।। अवसर तुमको है मिला ,पितर  करो सम्मान । दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।। जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास । फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।। सुशील यादव
दोहे ... सुशील यादव  दुर्ग # दुनिया  समझती है नहीं,नहीं समझते आप मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप # संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान # सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल # करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार # कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग # भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा रही  टकसाल # हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय # उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान # खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज सुशील यादव  दुर्ग खाने को  मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग # इतने सीधे लोग भी  ,बनते हैं लाचार कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार # # दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात # ७ अक्टूबर ५ अक्टूबर ...
122२    1222  1222 वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है # बना जाते सलीके से मुझे लायक ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से किसे मोती कभी आया पिरोना है # वफा के बीज डालो ये पता तो चले खफा मौसम रहा या नसीब बौना है # उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है # तरीके से मिला करती खुशी कल तक अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है # सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़ फेलुन १४ छोड़े हम बैठे होते,,,,, संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब  का हकलाना # हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना # बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता  है यादों के जंगल भीतर तक,  पैरहन भिगा जाना # लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना # सुशील यादव
बारूद बिछा कोना ,,,, -- हर किसी के आगे, अपना रोना ले-के, क्या करेंगे # ये मायूस फुलझड़ियां , बुझे-बुझे अनार , फाटकों की बे-आवाज सिसकियाँ फुसफुसाते से बिना धमाके वाले एटम बम इस दीवाली .... तोतली आवाज वाला खिलौना ले के क्या करेंगे -- उन दिनों की जो होती थी दीवाली व्यंजनों से भरी-भरी घर-घर सजती थाली वो इसरार से गले मिलना वो इंकार में सर का बेबाक-बेझिझक  हिलना वो फटाकों की लड़ियाँ वो धमाको की गूंज वो खत्म न होने वाली फुलझड़ियां बीते लम्हों में फिर से जीने का अहसास वो सपन सलौना ले-के क्या करेंगे ....? # आज  तकलीफों में, जमाना है, जिधर भी देखें शोर-दहशत, वहशियाना है रोज धमकियों के एटम धमनियों में उतारे जाते हैं धरती की मांग खून से सँवारे जाते हैं जगह -जगह चीख-चीत्कार है मजहब के नाम पर अपनी-अपनी ढपली अपनी दहाड़ है.... है अगर  जंग जायज तो जंग का ऐलान हो मुनादी हो ,शंख फूंके सभी को  गुमान हो कहाँ छुपे हैं दहशतगर्द कहाँ रहते हैं मौजूदा मर्द ...? हर सांस ,हर गली तकलीफो के  सिरहाने में सर टिका है अस्मत के कुछ खेल हुए ...
कोलकी-कोलकी हमला भइय्या, लोगन कहिथे अलख जगइय्या हमन सुराज सपना देखेन हमू शान बघारे हन रोवत-रोवत जउने आइन हाँसत-हाँसत तारे हन ऐ बस्ती ले ओ बस्ती सबो के पाँव पखारे हन उज्जर गोड़ के लोगन जाने हमला केवट पाँव धोवैय्या ... जिहां दिखिस अंधियार हमला उहचे दिया  बार के आएन जिहां मिलिस अन्याय बघवा उही करा बने ठठाएन कहु भुलाय के एखर सेती चीन्ह के रखहु   हमन सुराज सपना देखेन हमू शान बघारे हन रोवत-रोवत जउने आइन हाँसत-हाँसत तारे हन ऐ बस्ती ले ओ बस्ती सबो के पाँव पखारे हन उज्जर गोड़ के लोगन जाने हमला केवट पाँव धोवैय्या ... जिहां दिखिस अंधियार हमला उहचे दिया  बार के आएन जिहां मिलिस अन्याय बघवा उही करा बने ठठाएन दू-दू हाथ करे बर बैरी कहु भुलाय के एखर सेती चीन्ह के रखहु   टुटहा पनही गोड़ हमर, कतको दुरिहा रेंगे हन सुरुज सुराजे सपनावत,भुइयां ऐदे तारे हन बरय दिवाली के दिया,नइये कछु अंजोर करिया-करिया कस दिखे,टिकली-विकली तोर चलती चक्की देखकर ,रोया कभी कबीर आज उसी दम चाकरी ,हैं कुछ लोग अमीर # पाये प्रभु हम आपसे ,कितने भी दुत्कार हम आखिर ...
एक निशानी प्यार की .... कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन  भोग सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग सुशील यादव कोई नहीं अब सामने ,नहीं चुनौती शेष लंका सारी ढह गई  ,बचा नहीं लंकेश पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम तुमको भाता छीनना ,तुलसी से सिय-राम एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार सुशील यादव मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव ...
2122  2122  2122  22 कुछ नजरबन्दी,,,, रात भर सोया नहीं , पलकों खुमारी सी है कुछ तो तेरी तलब है ,कुछ बेकरारी सी है उखड़ जाते  टूट के  चट्टान   पहाड़ों से चाह की सूरत में फिसली बद्दुआ जारी सी है रेशा -रेशा चल न दे वो  ख्वाबगाहों से दूर तिनका-तिनका आजकल उसकी  तैयारी सी है घूरते हैं वो मेरी छत  इस तरह गोया कहीं सूचना बस  टूटने की जेब जारी सी है मेरे घर के आसपास रहा किये  है जमघट कुछ नजरबन्दी लगे  कुछ पहरेदारी सी है सुशील यादव 7.11.17 @@2 अब भी मेरी पलकों  में खुमारी सी है कुछ तेरी  तलब कुछ बेकरारी सी है उखड़े हुए हैं चट्टान पहाड़ों से असर किसी बद्दुआ की जारी सी है रेशा -रेशा चल न दे दूर  ख्वाबगाहों से तिनका-तिनका में आजकल  तैयारी सी है वो घूरते हैं मेरी छत को इस तरह गोया कोई सुचना इसके टूटने की जारी सी है मेरे घर के आसपास रहती है जमघट कुछ नजरबन्दी सी कुछ पहरेदारी सी है @@ @@