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Showing posts from December, 2017
@@ पिता पुत्र से बोलता ,देखो वीर सपूत सायकल तुझे सौप दूँ ,और निकाल सबूत $ सब की है ढपली यहाँ ,सबके अपने राग ढोल-नगाड़े  पीटना ,सुर जाए जब जाग $ महसूस नहीं हो हमे ,कतरो ऐसे पंख महा-समर आरंभ हो ,बज जाए फिर शंख $ फिर चुनाव आना हुआ,निकले वन से राम हर बगल है छुरी दबी,रखो काम से काम $ मानवता की आड़ में,दानव रहा दहाड़ अपनी कुटिया ले बचा,बैठा तोड़ पहाड़ फिर तिलक लगे रघुवीर .... अंग-अंग है  टूटता,छलनी हुआ शरीर कब छोड़ोग बोलना,अपना है कश्मीर जग सारा अब जानता,'पाक' नही करतूत भीतर से हर आदमी,छिपा हुआ बारूद जिस झंडे की साख हो,अहम सितारा-चाँद आखिर वही झुका-झुका ,शरीफजादा  मांद राम -राज दिन वो फिरें ,तरकश हो बिन तीर तुलसी फिर चन्दन घिसय ,तिलक लगे रघुबीर हिम्मत से अब काम लो ,ताकत करो जुगाड़ जिस भाषा जो बोलता ,उसमे  करो दहाड़ निर्णय को अब बाँट दो,जहाँ दिखे अतिरेक बीच अधीर धीरज तुम ,चुनना कोई एक परिचय अपना जान लो ,पाकिस्तानी लोग बीमारी उपचार भी ,जान-लेवा हम रोग सठियाये हो पाक जी ,बोलो करें इलाज आतंक की गोद उतर ,चल घुटने ...
बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल वादा  टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून. लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून @@@ इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओं का  रूप लिए ,निभा रहे किरदार सुशील यादव गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे है माया , छल-कपट,किसके कौन सहारे पापी, लोभी दुष्ट,व्यभिचारी  बात बनती गले कहीं तो दाल,रोटी की अलग गिनती सुशील यादव -- दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल मरा हुआ वो खाल ,खर्च की बरस कमाई नुक्ता-बिंदी की  महज ,गलतियां पकड़ा भाई जरा  उठाते बोझ ,अकल भी रहता बोहे बाते होती और ,गर्व कब  रिसता दोहे सुशील यादव सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार सुशील यादव टेलीपेथी ... बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय ## मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास खंगाल रहे क्यों...
@@@ मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम ## मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत इस जीवन  में आपको,मिले खुशी भंडार पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार ## गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार ## प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन ## बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन पानी पानी ढूढते,नीचे पैर  जमीन ## मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम मोरो बर लातेस .... रखिया ला झन तोड़, रखियान दे न जी मनखे हस तेड़गा , सोझियान दे न जी # देख लेतेव ,चार-धाम कहु दिन सुरता झमाझम,आन दे न जी # ताते-तात खाथन ,लोगन ले डर के मया के चीला, बसियान दे न जी # काखर  करन, हिजगा अउ पारी बने सुरसा के पेट,अघान दे न जी # मोरो बर लातेस ,फबे असन चूरी बहुरिया सरीखे, लजान दे न जी # सुशील यादव 2212   2212  1 212 22 मेरा किसी से जब मुकाबला नहीं होता सो आप ही आगे कहीं मैं निकल जाता हूँ @@ ...
2122  2122 212 कातिलो के चेहरे .... खून के छींटे पड़े ,पत्थर  में अब कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब ## कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का फैलती अफवाह ये  बंजर में अब ## कल  लुटेरा बन के लूटा गजनवी तुमने पहचाना उसे रहबर में अब ## याद हमको हैं खरोचें भी जरा लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब ### फैसलों की ये घड़ी शायद  नहीं जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब ## मेरी पेशानी में है यायावरी कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब ## सुशील यादव 122२    1222  1222 वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है # बना दोगे सलीके से मुझे लायक नजर की धूल पीछे महज सोना है कहाँ बनते यहाँ रिश्ते तरीके से किसे मोती कभी आया पिरोना है # वफा के बीज डालो ये पता तो चले खफा मौसम रहा कि नसीब बौना है # उसे पैगाम दे दो, खैरियत की मेरी मिसाल के तौर जिनको सुई चुभोना है # तरीके से मिला करती खुशी कल तक अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है # सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़ एक अजायबघर ... ___ योजना है नगर विन्यास की गांधी पुतले के चारों तरफ ...
सुशील यादव 2122 2122 212२ सोच कर देखो कहीं कोई छुपा है आदमी बेखौफ हो किधर जिन्दा है वक्त आने दो मुनासिब सा हमारा हम बता देंगे कहाँ कोई खपा है हम नहीं जो पा सके, २१२२  २१२२ २१२२ -- सूख कर मुझसा कोई, कांटा हुआ है आज तुम ये देख लो,तमाशा हुआ है  -- जंग में हारा हुआ, लौटा सिपाही महफिलों में आप ही, नकारा हुआ है -- कौन  घाटे बेचता, सौदा कभी भी जब तलक मंदी का, ईशारा हुआ है -- हम नहीं जो पा सके, फिर उस मुकाम को छोड़ के आना जिसे, गवारा हुआ है -- बुलन्दी पाने, 'सुशील' रहा तरसता जरूरतों की फिक्र का, मारा हुआ है -- सुशील यादव न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़) 24.7.17
बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल सुशील यादव # बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन पानी- पानी ढूढते,नीचे पैर  जमीन  सुशील यादव मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम सुशील यादव # ## गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार सुशील यादव # ## जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग सुशील यादव # ## प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन ## प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन सुशील यादव # ## ## मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम ## कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत ## जाने कैसे लोग ये .... ## खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन। हर करत...
बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल सुशील यादव # बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन पानी- पानी ढूढते,नीचे पैर  जमीन  सुशील यादव मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम सुशील यादव # ## गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार सुशील यादव # ## जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग सुशील यादव # ## प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन ## प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन सुशील यादव # ## ## मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम ## कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत ## जाने कैसे लोग ये .... ## खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन। हर करत...
मन बबूल से छिल गया ...... हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन । मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।। पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार । कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।। अवसर तुमको है मिला ,पितर  करो सम्मान । दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।। जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास । फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।। सुशील यादव
दोहे ... सुशील यादव  दुर्ग # दुनिया  समझती है नहीं,नहीं समझते आप मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप # संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान # सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल # करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार # कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग # भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा रही  टकसाल # हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय # उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान # खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज सुशील यादव  दुर्ग खाने को  मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग # इतने सीधे लोग भी  ,बनते हैं लाचार कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार # # दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात # ७ अक्टूबर ५ अक्टूबर ...
122२    1222  1222 वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है # बना जाते सलीके से मुझे लायक ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से किसे मोती कभी आया पिरोना है # वफा के बीज डालो ये पता तो चले खफा मौसम रहा या नसीब बौना है # उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है # तरीके से मिला करती खुशी कल तक अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है # सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़ फेलुन १४ छोड़े हम बैठे होते,,,,, संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब  का हकलाना # हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना # बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता  है यादों के जंगल भीतर तक,  पैरहन भिगा जाना # लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना # सुशील यादव
बारूद बिछा कोना ,,,, -- हर किसी के आगे, अपना रोना ले-के, क्या करेंगे # ये मायूस फुलझड़ियां , बुझे-बुझे अनार , फाटकों की बे-आवाज सिसकियाँ फुसफुसाते से बिना धमाके वाले एटम बम इस दीवाली .... तोतली आवाज वाला खिलौना ले के क्या करेंगे -- उन दिनों की जो होती थी दीवाली व्यंजनों से भरी-भरी घर-घर सजती थाली वो इसरार से गले मिलना वो इंकार में सर का बेबाक-बेझिझक  हिलना वो फटाकों की लड़ियाँ वो धमाको की गूंज वो खत्म न होने वाली फुलझड़ियां बीते लम्हों में फिर से जीने का अहसास वो सपन सलौना ले-के क्या करेंगे ....? # आज  तकलीफों में, जमाना है, जिधर भी देखें शोर-दहशत, वहशियाना है रोज धमकियों के एटम धमनियों में उतारे जाते हैं धरती की मांग खून से सँवारे जाते हैं जगह -जगह चीख-चीत्कार है मजहब के नाम पर अपनी-अपनी ढपली अपनी दहाड़ है.... है अगर  जंग जायज तो जंग का ऐलान हो मुनादी हो ,शंख फूंके सभी को  गुमान हो कहाँ छुपे हैं दहशतगर्द कहाँ रहते हैं मौजूदा मर्द ...? हर सांस ,हर गली तकलीफो के  सिरहाने में सर टिका है अस्मत के कुछ खेल हुए ...
कोलकी-कोलकी हमला भइय्या, लोगन कहिथे अलख जगइय्या हमन सुराज सपना देखेन हमू शान बघारे हन रोवत-रोवत जउने आइन हाँसत-हाँसत तारे हन ऐ बस्ती ले ओ बस्ती सबो के पाँव पखारे हन उज्जर गोड़ के लोगन जाने हमला केवट पाँव धोवैय्या ... जिहां दिखिस अंधियार हमला उहचे दिया  बार के आएन जिहां मिलिस अन्याय बघवा उही करा बने ठठाएन कहु भुलाय के एखर सेती चीन्ह के रखहु   हमन सुराज सपना देखेन हमू शान बघारे हन रोवत-रोवत जउने आइन हाँसत-हाँसत तारे हन ऐ बस्ती ले ओ बस्ती सबो के पाँव पखारे हन उज्जर गोड़ के लोगन जाने हमला केवट पाँव धोवैय्या ... जिहां दिखिस अंधियार हमला उहचे दिया  बार के आएन जिहां मिलिस अन्याय बघवा उही करा बने ठठाएन दू-दू हाथ करे बर बैरी कहु भुलाय के एखर सेती चीन्ह के रखहु   टुटहा पनही गोड़ हमर, कतको दुरिहा रेंगे हन सुरुज सुराजे सपनावत,भुइयां ऐदे तारे हन बरय दिवाली के दिया,नइये कछु अंजोर करिया-करिया कस दिखे,टिकली-विकली तोर चलती चक्की देखकर ,रोया कभी कबीर आज उसी दम चाकरी ,हैं कुछ लोग अमीर # पाये प्रभु हम आपसे ,कितने भी दुत्कार हम आखिर ...
एक निशानी प्यार की .... कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन  भोग सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग सुशील यादव कोई नहीं अब सामने ,नहीं चुनौती शेष लंका सारी ढह गई  ,बचा नहीं लंकेश पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम तुमको भाता छीनना ,तुलसी से सिय-राम एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार सुशील यादव मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव ...
2122  2122  2122  22 कुछ नजरबन्दी,,,, रात भर सोया नहीं , पलकों खुमारी सी है कुछ तो तेरी तलब है ,कुछ बेकरारी सी है उखड़ जाते  टूट के  चट्टान   पहाड़ों से चाह की सूरत में फिसली बद्दुआ जारी सी है रेशा -रेशा चल न दे वो  ख्वाबगाहों से दूर तिनका-तिनका आजकल उसकी  तैयारी सी है घूरते हैं वो मेरी छत  इस तरह गोया कहीं सूचना बस  टूटने की जेब जारी सी है मेरे घर के आसपास रहा किये  है जमघट कुछ नजरबन्दी लगे  कुछ पहरेदारी सी है सुशील यादव 7.11.17 @@2 अब भी मेरी पलकों  में खुमारी सी है कुछ तेरी  तलब कुछ बेकरारी सी है उखड़े हुए हैं चट्टान पहाड़ों से असर किसी बद्दुआ की जारी सी है रेशा -रेशा चल न दे दूर  ख्वाबगाहों से तिनका-तिनका में आजकल  तैयारी सी है वो घूरते हैं मेरी छत को इस तरह गोया कोई सुचना इसके टूटने की जारी सी है मेरे घर के आसपास रहती है जमघट कुछ नजरबन्दी सी कुछ पहरेदारी सी है @@ @@
किस मिटटी के हो बने ,माधो  मेरे यार नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार छोटे-छोटे  दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात सुशील यादव 9.11.17 अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस नेता  आकर जीम लो,कंबल वाली घूस महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न  काम बातो की बस  छूरियां,संकट रहता राम सुशील यादव कोमल मुरझाया डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल
2122 2122 2122 इस शराफत आईने में ये हमारी  सोच की नई फ़स्ल देखिये लाशें-ज़िंदा, बेजुबान सी  नस्ल देखिये जब  सुराग मिला नहीं,मुमकिन तलाश में अब मिसाल के तौर तर्जे-क़त्ल देखिये हम जुदा तस्वीर हैं नामें- वफा आजकल इस शराफत आईने में  शक्ल देखिये गो नहीं होता मदारी  खेल आजकल इंतिखाब घड़ी गरीबो से वस्ल देखिये यार  मेरे दे वजीफो में  दुवाये साथ गुरबत पास हो ये अक्ल देखिये सुशील यादव ,दुर्ग (छ.ग.)
११ फे देने को पास तेरे  खैरात नहीं है या लेने की मेरी औकात नहीं है मैं समुन्दर हूँ खंगाल मुझे लो जी से अभी किसी ने की  शुरुआत नहीं है 22१२   2212   २१22 मैं आइना  तुझे टूट कर चाहता हूँ कुछ बोलता नही रूठ कर चाहता हूँ है कफस में मेरी यहां जिंदगी भी 'पर'खोल दो अभी छूट कर चाहता हूँ @@ तुझपे थोड़ा सितम कर लेंगे अपना दुःख यूँ कम कर लेंगे बिगड़ेगी अपनी बात कभी टोना समझ वहम कर लेंगे हासिल ना हो सुविधा हमको जरूरत में संयम कर लेंगे आज  तसल्ली देने वालो खुश होने का भ्रम कर लेंगे तंज कसे हो हम पर कितने जहर 'सुशील 'हजम कर लेंगे
सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश कैसे  मूक बधिर रहे  ,बैठे थे खामोश जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम सुशील यादव खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिम काल हम भी नहा-निचोड़ के ,बैठे हुए शरीर दिमाग लेकिन  देखता , अधनंगी तस्वीर
## आओ कि सफर की अब थकान भूल जाएँ बहुत हो चुका गमो की मीजान भूल जाएँ बैठें किसी लुढ़कते पत्थर में जानिबे मंजिल राह में मिले हादसों की ढलान भूल जाएँ कुछ रहनुमा अपने कुछ शय अपनी कुछ सामान अपने पैदा होते ही साथ चले आये गमो के मीजान अपने मैं खुशी से उसे अपने साथ लिए जाऊंगा वो जो बिठा रखे हैं अश्कों के दरबान अपने
२ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ सुशील यादव जिद की बात नहीं.... है कौन जिसे दर्द का एहसास नहीं होता सब कुछ होते हुए भी,कुछ पास नहीं होता   $$$ चल देते हैं छोड़ , करीबी लोग अचानक लुट जाने का मन को आभास नहीं होता   $$$ मै अपने तर्कों की दुनिया में हूँ  तनहा तेरी दखल यहाँ कोई , ख़ास नहीं होता   $$$ हर शाम बुझा रहता, ये दिल एहतियातन जुगनू अच्छे लगते,जब उजास नहीं होता   $$$ समझा के रखता हूँ दिल-ए-नादाँ को तभी जिद की बात नहीं, बहुत उदास नहीं होता   $$$ सुशील यादव कौन है जिसे दर्द का, एहसास नहीं होता सब कुछ होते हुए, कुछ पास नहीं होता   $$$ छोड़ कर चल देते हैं करीबी लोग अचानक उनके छोड़ जाने का मन को आभास नहीं होता   $$$ मै अपने तर्कों की दुनिया में रह जाउंगा तनहा तेरी दखल मेरी जिन्दगी में अब ख़ास नहीं होता   $$$ बुझा देता हूँ शाम से  चिरागों को एहतियातन जुगनू भी अच्छे लगते हैं जब उजास नहीं होता   $$$ समझा के रखता हूँ दिले नादाँ को बारहा किसी बात की जिद नहीं ,उदास नहीं होता   $$$ १३.८.१६
चाउर बबा के नाती दू रुपिया चाउर खवा ,बना ड़ारिन अलाल छत्तीसगोंदा तुम करव ,छत्तीसगढ़  के लाल खेत किसानी काम बर,कमइय्या कती लान दारू व्यसन छोड़य सब ,इहों बिहार बनान चाउर बबा के नाती ,दिखत तुंहर हे मात ताजा जेवन परस दय ,बासी खात अघात चाउर बबा के नाती ,अइसन पकड़ो कान उधार कोनो झन करे ,कोंदा समझ दुकान चाउर बबा के नाती,अइसन रख मर्याद गुरहा चीला कस लगे,नुन्छुरहा के स्वाद सुशील यादव नुन्छुर कस मोला लगय ,बात-चीत व्यवहार कस बिताबो पांच बछर, असकट मे सरकार लिख-लिख ले अरजी घुमन,काखर-काखर द्वार कोनो कान कहां धरय ,सुनय हमार गोहार बिहिनिया कुकरा बासत,भूकय  कुकुर हजार रुई गोजाय कान कस,निभय तुहार -हमार आम आदमी बस कहव, आमा चुहके दारि फिर बाद बेहाल करव,मारे-मार तुतारि सुख के संगवारी हमर ,काबर रहे लुकाय जउन मिले मिल बांट के ,देवी भोग लगाय सुशील यादव
२२१२   २२१२     २२१२    १२१२ दरवेश के हर हुजरे से अब मेहमां हटाइए जो लाश ले चलती गरीबी,दरमियाँ हटाइए बार-ए-गिरेबा को कलफ न मिले जहाँ नसीब में तहजीब  की अब उस कमीज से गिरेबां हटाइए ये है निजाम तेरा, सफीना सोच कर उतारना चलती हवा दरिया से बे-मकसद तुफां हटाइए उनको बिछा दो मखमली कालीन मगर साहेब उम्मीद  की बुनियाद हों काटे, वहाँ  हटाइए जाने कोई क्यों खटकता है आँख में दबा-दबा अब हो सके मायूस  नजरें  अँखियाँ हटाइए सुशील यादव १.९.१६ दरवेश =saint हुजरे=private chamber बार-ए-गिरेबाँ-weight of coller ऑफ़ शर्ट निजाम = व्यवस्था ,सफीना=नाव
सामयिक दोहे सत्तर बरस ओढ़-पहिन ,चिथरागे जी कोट उज्जर असन धरे-बने ,करियागे सब नोट सुशील यादव 20.12.16 मंदिर धजा उतार के ,पहिरे हव लँगोट प्रभू नाम तो जापते ,मन में कतको खोट सुशील यादव २१.1२.१६ पन्ने बिखरे अतीत के ,सिमटा देखा नाम बैठी रहती तू  सहज ,पलक काठ गोदाम हमको तुमसा आदमी,मिलता कभी-कभार बिना जान पहिचान के ,देता नोट उधार सुशील यादव २२.1२.१६ नोट-काले  जेब रखे ,उजली बहुत कमीज तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज सुशील यादव 27.12.16
२२१२      २२१२ २२१२      १२ लम्हा  नहीं ऐसा कोई,सजदा नहीं किया कोई मंजिल तेरे सिवा, देखा नहीं किया चौखट जहाँ,माथा नवा सब मांगते रहे हमने नबी तुझसे कभी मागा नहीं किया देना अगर होता दे देते बस सुकून ही दौलत तिजौरी में कभी चाहा नहीं किया इस  कौम की हो दांव में इज्जत व आबरू इस कौम के लोगों ने बस  सोचा नहीं किया अदब से लिया महफिल में तेरा नाम सोचिये तुझको भरी महफिल कभी रुसवा नही किया सुशील यादव 
धनाक्षरी 1      $     'पर' जिनके कटे थे ,वो परिंदे कहाँ  गए      लो सीधे-सादे गाँव के, बाशिंदे  कहाँ गए      $      जमीन खा गई उसे ,कि निगला आसमान      निगरानी शुदा थे जो , दरिन्दे कहाँ गए      $      बस इसी जगह तो,कल्पना का लोक था      सब चीजें मिल रही ,घरौंदे कहाँ  गये      $      मजहब की जमीनो में,ये बारूद और  धुँआ      ढेर लगे हैं लाशो के ,जिन्दे कहाँ गये      $      तेरे होने का सुकून ,रहता कहीं भीतर      सर रखे हम रोते ,वो कंधे कहाँ गए      $                 सुशील यादव घनाक्षरी 2 @ घुलने लगा जहर ,बेहाल जिंदगी में गिनता हूँ जुगनू भी ,मै रात चांदनी में @ तुम गए नहीं देखो ,मुह फेरता समय बदहाल जी रहे हैं ,भटके बेबसी में @ हमने लिखा रेत में ,खत तुम्हारे नाम संदेश मिल...
हिल गई दीवार ....... सुशील यादव .......... # तंग गली दिल की कभी सजा देते मुड़ के ज़रा सा तुम मुस्कुरा देते # कुछ तसल्ली हो रहती सुकून होता अगर खताओ की मुझे सजा देते # दिन गिन के काट रहे यहाँ खौफ में आहट या आने की इत्तिला देते # हिल गई दीवार पुराने रिश्तों की नीव को फिर से अब हौसला देते # तेरे शहर घूम रहा हूँ आवारा काश ठिकाना, अपना पता देते # पास बचे हैं बस मंजिलो के निशा मंजिल तक पहुचने रास्ता देते # सीख नहीं पाए हमी हुनर कसम से चाहत के दांव तुझे सिखा देते #
सबकी नावें ..... # केवल सुख आधार नहीं है कल्पना में विस्तार नहीं है # सबकी नावें पार उतरती अपना बेड़ा-पार नहीं है # नगद-नगद ही कसमे खाई तुमसे कहीं उधार नहीं है # सुलग-सुलग जाती ये बस्ती सोई कहीं सरकार नहीं है # जात-पात नाम ठगी है ढाई-आखर दरकार नहीं है # बेच के घोड़े मस्ती में सोए किस्मत-धनी लाचार नहीं है # अंधविश्वास सबकी बीमारी ठोस कहीं उपचार नहीं है # लोग नफा-नुकसान सोचें चाहत अपना व्यापार नहीं है # सुशील यादव
आम आदमी ..... @ हमने तुमको नोट बदलते नहीं देखा काले-उजले फेर में चलते नहीं देखा @ तुम सितमगरों की दुनिया,रहने के आदी चट्टान दबे नीचे, निकलते नहीं देखा @ जो आज कमा ली,हो गया बसर के लायक हो ईद- दिवाली कि , उछलते नहीं देखा @ टूटे हुए लगते हैं सभी चाँद सितारे किस्मत की बुलन्दी को निगलते नहीं देखा @ पानी की तरह हो गया है खून तुम्हारा खूं जैसे इसे हमने उबलते नहीं देखा @ सुशील यादव 221 1221 1221 122
##2221   2221  2221  212 छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा..... जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा रिश्तों को, अचानक तोड़ना,अच्छा नहीं लगा #$# मातमपुर्सी आते, लोग हैं आजकल इस तरह रस्मो को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा #$# काबिल हो अभी माफी के दीगर बात है वर्ना जगह-जगह पे हो जाते रुसवा, अच्छा नहीं लगा #$# तुम सम्हाल लो अपनी तमाम ये सल्तनत यहीं कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा #$# गम के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील' 'नोटों' आप-खुद का बिखरना, अच्छा नहीं लगा #$# लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा, अच्छा नहीं लगा #$# सुशील यादव 14.12.16
सुशील यादव २१.1२.१६ भुर्री बारो सिपचा दो जी उप्पर बात पहुचा दो जी गोड़ हमर खियाय असन हे पंदोली दे चघा दो  जी साल नवा आतेच  होही ऊंघइया ला जगा दो जी मुंदरी पहिरे साध मरत अंगरी हमर नपा दो जी वोट मंगैय्या आवत हे का फैटिका बने ओधा दो जी उघरा राखेव  मया कतेक पातर पनियर  ओढा दो जी साल नवा अब का करन,नोट-नवा पिचकाट नींद सुतन पलँग हम ,खर्रा जागन खाट
सोचती हूँ तुझे..... ~ सोचती हूँ तुझे सब ध्यान में रखती हूँ ये शराफत जतन से म्यान में रखती हूँ कब सजाने दिया तुमने मुझे  तस्वीरे चीज हर फेकने की मकान में रखती हूँ गुजर जाती, रो-रो के जिन्दगी भी अपनी दर्द चुपचाप ही  मुस्कान में रखती हूँ तडफ सीने उठा करती है रह -रह शायद कोई  तेज़ाब  जहन- जुबान में रखती हूँ सितम लोगो ने क्या ढाए बताना मुश्किल रोज दीपक कहो तूफान में रखती हूँ सुशील यादव ६-१०-१६
2122        १२२२   2212 जिसे सिखलाया बोलना..... चश्म  नम और दामन तर होने लगा जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन अब पसीने से नम कालर होने लगा दाउदों के पते पूछो तो हम कहें पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान पांव के छालो का असर होने लगा बेजुबां बुत जिसे  सिखलाया बोलना पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा सुशील यादव ६.१०.१६

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सुशील यादव तिनका-तिनका तोड़ के ,रख देता है आज है कहीं अकड की बस्ती ,फिजूल कहीं समाज परिभाषा देशहित की, पूछा करता कौन बहुत खरा एक बोलता, दूजा रहता मौन भव-सागर की सोचते, करने अब की पार गए निकल चुकाने तभी, गिन-गिन कर्ज-उधार गया उधर एक मालया, हथिया के सब माल किये हिफाजत लोग वे, नेता, चोर, चंडाल देश कभी तू देख गति, है इतनी विकराल यथा शीघ्र सब जीम के, खाली करो पंडाल मुह क्यों अब है फाड़ता, कमर तोड़ है दाम किसको कहते आदमी, चुसा हुआ है आम *** दृष्टिकोण ......दोहे लगता है सबको बुरा, गिनती के दिन चार इभन-आड के फेर में, ताक रहे इतवार कहते जो कहते रहें, पानी बिन सब सून सर्किट हाउस ले मजे, तन्दूर मुर्गा भून आई पी एल खेल मे, देश सहे ये मार मिनट करोड़ों मिटा रहे, सींचय खेत न खार माङ्ग किये जो आरक्षण, ठूसे उनको जेल इस सरकार की इंजन, डाले जिनने तेल देशद्रोह के जुर्म का, लगना है अब आम किसकी चलती देश में, किसके हाथ लगाम दोहे बन में सूखी लकड़ियाँ ,घर में सुलगे देह धुँआ -धुँआ होता रहे ,मन उपजा संदेह मौन जुलाहा कह रहा,ले धागा औ सूत ताने से तन ढांक ले,बाने से मन भूत...

राधिका छंद

किस मिटटी के ...(राधिका छंद,13-9) छोटे-छोटे  दिन हुए ,बड़ी-बड़ी  रात सुबह-सुबह के कोहरे ,बर्फ दबी  बात अगहन के दिन आलसी ,पूस नहीं काम अब अलाव में राख है ,आग नहीं राम महाकाय सी छवि बनी, व्यर्थ मगर नाम बातो की बस  छूरियां,रखे बगल  राम किस मिटटी के हो बने ,यार माधो बोल नेता जडे दुलत्तियाँ ,बन्द समझ खोल सुशील यादव जैसी सूखी लकडियाँ , सुलग रही देह धुंआ- धुआ होता रहे ,पाप मन स्नेह सुशिल यादव ,दुर्ग 
सुशील यादव के दोहे ... २.१२.१७ susyadav7@gmail.com New Adarsh Nagar Zone 1,Street3 Durg (C.G.) जग में सारे घूम के ,लगता  रहा  कयास ऊपरी धन का जोड़ना,करता बहुत उदास रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन कल जो तू सरताज था,मत कर आज यकीन जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम   बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल वादा  टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल कौन किया है बोल भी,पानी तेरा खून. लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान फिर से लंका जीत अब  ,थका हुआ हनुमान समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग सोच समझ के तौलता ,भाई है  बजरंग भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओ  के रूप में   ,निभा रहे किरदार हम आजाद हैं , -- मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान । उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।। -- सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान । ले...